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Gori Dutta

गौरी दत्त

डॉ. राम निरंजन परिमलेन्दु के अनुसार। जन्म : सन् 1836 ई. लुधियाना। मृत्यु : सन् 1890 ई. मेरठ। ‘नागरीं की सेवा में दीवानगी की हद तक समर्पित। हिन्दी प्रचार में डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय  ने इन्हें प्रतापनारायण मिश्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त आदि की पंक्ति में रखा था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास' में गौरीदत्त जी का बड़े आदर से उल्लेख किया है—’भारतेन्दु के अस्त होने के कुछ पहले ही नागरी प्रचार का झण्डा पं. गौरीदत्त ने उठाया। वे मेरठ के रहने वाले सारस्वत ब्राह्मण थे और मुदर्रसी करते थे। अपनी धुन के ऐसे पक्के थे कि चालीस वर्ष की अवस्था हो जाने पर इन्होंने अपनी सारी जायदाद ‘नागरी प्रचार' के लिए लिखकर रजिस्ट्री करा दी और आप संन्यासी होकर नागरी प्रचार का झण्डा हाथ में लिये चारों ओर घूमने लगे।'