Loading... Please wait...

Aakash Champa

RRP:
Rs 350.00
Your Price:
Rs 263.00 (You save Rs 87.00)
ISBN:
81-89914-77-4
Author:
Cover:
Quantity:
Bookmark and Share


Preface

आकाशचम्पा

क्या जीवन आकाशचम्पा  है?

दो-दो बार वसन्त आता है इसमें, दो-दो बार खिलती हैं आकाशचम्पा की कलियां - जिन्दगी की तरह। एक बार जो जीवन जिया उसमें कितना कुछ जीने से रह गया, जिस-जिस मोड़ पर मुड़ना था, नहीं मुड़े, जहा पलटकर पीछे देखना था नहीं देखे, जहाँ ठहरना था, नहीं ठहरे। सो, आकाशचम्पा उन भूलों को सुधारती है, पहली बार जिन डालों में फूल नहीं आये होते, दूसरी बार उन डालों पर भी फूल खिलते हैं।

गहन अनुभूतियों की बारीक बुनावट से रचा गया संजीव का यह नवीनतम उपन्यास मनुष्य की इस आदिम आकांक्षा का ऐसा मार्मिक आख्यान है, जिसमें व्यक्ति-जीवन के कोण से इतिहास, नियति, रिश्ते और संघर्ष के उन तमाम सवालों की पड़ताल की गई है, जो हमारे समय के विमर्श के केन्द्र में हैं। इन अर्थों में यह उपन्यास महज आआखयान आख्यान नहीं रह जाता, बल्कि अपने  समय से एक दुर्धर्ष टकराहट के रूप में पृष्ठ-दर-पृष्ठ ध्वनित होता है। संजीव ने इस उपन्यास में अपने दिक्काल का ऐसा निर्मम विवर्तन किया है, जिसे अन्यत्र देख पाना कठिन है।

विवर्तन की प्रक्रिया में लेखक की नज़र निरन्तर इतिहास के अन्दर विलंबित और निलंबित पड़े सवालों और इतिहास के बाहर छूटे हुए लोगों तक जाती है। इतिहास में सही-गलत का फैसला होने में सदिया गुजर जाती हैं और इसके बाद भी कई बार फैसला नहीं हो पाता। सामाजिक अवक्षय ने भले ही मनुष्य को हताश कर दिया हो, पर इस स्थिति में भी उसके न दय के कोने में यह आकांक्षा अपनी पंखुड़यां खोलने से नहीं चूकती कि क्या भूलों का फिर से संशोधन हो सकता है?

इस तरह संजीव नियति नहीं नियन्ता की कथा कहते हैं, उस नियन्ता मनुष्य की जिसने अपनी जिजीविषा को आत्मसंघर्ष की ताकत से मूर्त किया है और अपने मुक्तिस्वप्न को एक ही जीवन में दो बार संभव किया है।

उपन्यास की अनुषंगिक उपलब्धि है एक वर्जित पर मार्मिक प्रेम प्रसंग, जिसकी  स्नग्धता और सुरभि उपन्यास में एक नया आयाम जोड़ती है।


Find Similar Books by Category


Related Books

You Recently Viewed...