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Adhoori Ibaarat

RRP:
Rs 400.00
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ISBN:
978-81-89962-12-8
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Preface

अधूरी इबारत

एक आग है जिसमें मैं जलता रहता हूँ। अपना सारा अस्तित्व इसी आग के हवाले है। एक दिन पूरा जीवन ही जल कर राख हो जाएगा,यही आखिरी सच है। लेकिन भविष्य का सपना इतना मादक और नशीला है कि उसकी खुमारी में आदमी कोई भी खतरा उठाने को तैयार हो जाता है। तब मौत से टकरा जाना उसके लिए दिलकश खेल हो जाता है और तभी मृत्यु,मृत्यु न रहकर जीवन की निरन्तरता में बदल जाती है...

घोर अपमान,गहरी निराशा और टीसते जम्मों के अलावा कुछ सामान और भी है जिसे मैं सीने से लगाये खड़ा हूँ—कुछेक बने-अधबने चित्रों और सादे कागज़ों की एक फाइल, दो-चार ब्रश, पेंसिलें, पेस्टल और जलरंगों के डिब्बे और छोटा-सा एक ड्राइंग बोर्ड। यही वह सामान है जिसमें मेरी सांसें अटकी हैं। इसी थोड़ी-सी सामग्री के बहाने उम्मीद की नयी किरण मुझमें फूटती रही है...और अब मुझे जलाने वाली यह आग मेरी ताकत बन जाती है, जीवनदायिनी ऊर्जा, जिसकी रोशनी में मैं खुद को पहचानने की कोशिश करता हूँ...

अधूरी इबारत का गद्य चित्रकार एवं साहित्यकार हरिपाल त्यागी की रचनात्मक कला-यात्रा और जीवन-विकास की पृष्ठभूमि को दर्शाने के लिए है। अपने शीर्षक से अधूरेपन का भ्रम के बावजूद,यह अपने आप में एक सम्पूर्ण कृति है। यह एक कलाकार के अभावों और दुखों को महिमामण्डित न करके उसकी जिजीविषा और कला के प्रति उसके समर्पण तथा आस्था को ही अधिक महत्त्व देते हुए प्रेरणादायक सिद्ध होगा। अपने समय को शब्दों में उकेरने का यह प्रयास पाठकों को अवश्य पसन्द आएगा, इसी उम्मीद के साथ...


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