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Bade Bhai Sahab / Gulli Danda

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Rs 45.00
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ISBN:
81-89850-44-x
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Preface

बड़े भाई साहब / गुल्ली-डण्डा 

बीस साल गुजर गये। मैंने इंजीनियरी पास की और उसी जिले का दौरा करता हुआ, उसी कस्बे में पहु¡चा और डाकबंगले में ठहरा। उस स्थान को देखते ही इतनी मधुर बाल-स्मृतियां उदय में जाग उठीं कि मैंने छड़ी उठायी और कस्बे की सैर करने निकला। आँखें किसी प्यासे पथिक की भा¡ति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थीं; पर उस परिचित नाम के सिवा वहां और कुछ परिचित न था। जहाँ खण्डहर था, पक्के मकान खड़े थे। जहां बरगद का पुराना पेड़ था; वहाँ अब एक सुन्दर बागीचा था। स्थान का काया-पलट हो गया था। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं इसे पहचान भी न सकता। बचपन की संचित और अमर स्मृतियां बाँहें खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थीं; मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जी होता था कि उस धरती से लिपटकर रोऊ और कहूं, तुम मुझे भूल गईं। मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूँ।

सहसा एक खुली हुई जगह में मैंने दो-तीन लड़कों को गुल्ली-डण्डा खेलते देखा। एक क्षण के लिए मैं अपने को बिलकुल भूल गया। भूल गया कि मैं एक ऊंचा अफसर हूँ, साहबी ठाट में, रौब और अधिकार के आवरण में।


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