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Barah Ghante

RRP:
Rs 220.00
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ISBN:
978-81-89962-82-1
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Preface

बारह घण्टे

सपने देखना बुरी बात नहीं है और ऐसा कोई सपना देखना जिसमें समाज हित की भावना प्रबल हो, यह और श्लाघनीय है। ख्वाज़ा अहमद अब्बास ऐसे ही लेखक रहे हैं, जिन्होंने समाज के बदलाव का और  इनसान की बेहतरी का सपना देखा।

ख्वाज़ा साहब प्रगतिशील चेतना के संवाहक थे। कट्टर कम्युनिस्ट। अमीरी और गरीबी के विभेद को वे स्वीकार नहीं करते थे। वे एक लेखक और एक फिल्मकार के रूप में दोनों के बीच की दीवार को जीवन-भर तोड़ने की कोशिश करते रहे। उनकी समाजवादी विचारधारा उनके लेखन और उनकी फिल्मों में इस कदर हावी रही कि अकसर उनमें स्थूलता नज़र आने लगती थी, मगर ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने इस सबकी कभी परवाह नहीं की और अपने लेखन तथा सिनेमा को अपनी विचारधारा का आईना बनाये रखा।

'बारह घण्टे' की कहानियां ऐसी ही कहानियां हैं, जिनमें उनके सपने, उनकी मुहब्बत और उनका आक्रोश हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भाषा की तरलता के साथ व्यंग्य का प्रयोग उनकी रचनाओं को धार ही नहीं देता बल्कि सहज सम्प्रेषणीयता के चलते विचारणीय भी बनाता है। राजनैतिक चेतना-संपन्न अब्बास साहब जैसे एक सर्जक व्यक्ति की रचनाओं का, आशा है, पाठक स्वागत करेंगे।


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