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Budhi Ki Vapsi / Khoka Ki Gari

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ISBN:
81-89850-85-7
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Preface

बुधी की वापसी 

हमारी गाय खो गई, पता नहीं, कौन उसे कसाईखाने में भेज दे या उसे बाँध ले, मगर मेरी बात भला कोई सुननेवाला है। देखो तो जरा, गाय का क्या हाल हो गया है!

यह कहते-कहते वह बुधी के पास आ गई। फिर चौंककर बोली, ''यह तो हमारी गाय नहीं है। जरा देखो तो, न जाने किसकी गाय पकड़कर यहा¡ ले आया है। ओह, इस लड़के को भी क्या कहूं यह तो भुवन की माँ  की गाय लगती है। अगर पता चल जाए तो वह आकर मेरे चौदह पुरखों को ताने मारने बैठ जाएगी।''

उस औरत ने बुधी की रस्सी खोलकर उसे कुछ दूर खदेड़कर अपने घर से बाहर कर दिया। शायद इसलिए कि भुवन की मा¡ के अचानक यहा¡ आने के पहले वह उस गाय को भगाकर अपने को पाक-साफ कर लेना चाहती थी।

इस गाँव के बाहर एक जगह एक बहुत बड़ा पेड़ था। उसके नीचे पहुंचकर बुधी ने कुछ देर सुस्ता लिया। चारों तरफ खेतों में धान की फसल लहलहा रही थी। बुधी की उन्हें खाने की बड़ी इच्छा हुई, लेकिन यह उसका गाँव नहीं था। अगर कोई उसे फिर किसी बाड़े में डाल दे तो उसे जुर्माना भरकर छुड़ानेवाला कोई नहीं मिलेगा। अब वह कहीं कैद नहीं रहना चाहती थी। ओफ, अभी भी उस ऊंची चारदीवारीवाली इमारत, उन कठघरों और उन बेहूदी आवाजों की याद आते ही वह कांपने लगती थी।


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