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Chitragupt Ki File

RRP:
Rs 125.00
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ISBN:
978-81-89962-84-5
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Preface

चित्रगुप्त की फाइल 

फैण्टेसी में रचे गये इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने बड़ी ही कुशलता से चौथे और पांचवे दशक के संधिकाल के जीवन के यथार्थ को पकड़ने की कोशिश की है।

मुख्य चरित्र अभिमन्युं के कथानक के इर्द-गिर्द घूमते घटनाक्रम के ज़रिये हम एक बड़े फलक पर उस दौर की व्यवस्था में सेंध लगाते भ्रष्टाचार और स्वार्थपरता के जघन्य चेहरे को साफ-साफ पहचान पाते हैं। मिल मालिकों और मज़दूरों के बीच बढ़ती खाई तथा पूंजीवाद के भावी खतरों को पहचानती लेखक की पैनी नज़र हमें एक ऐसे क्रूर भविष्य के विषय में आगाह करती है जो एक अनिवार्य आर्थिक पराधीनता के साथ-साथ मानसिक परवशता का अभिशाप लेकर आनेवाला है। पूंजीवाद के दबावों और रंगीन आग्रहों के बीच ट्रेड यूनियन की भूमिका के बदलते चेहरे की भी लेखक ने बड़ी मार्मिकता से शिनाख़त की है और प्रकारान्तर से अपनी राजनैतिक एवं वैचारिक प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है।

यह उपन्यास व्यापक अर्थ में वर्गभेद की दारुण सच्चाई और समाज के नैतिक पतन का मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ है। लेखक ने समय की बड़ी चुनौतियों की ओर इशारा करते हुए कथानक को जिस रोचक ढंग से विकसित किया है, वह पाठकों को अन्त तक उपन्यास के साथ बांधे रखता है।


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