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Dhratrashtra

Price:
Rs 155.00
ISBN:
978-81-908653-0-2
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Preface

धृतराष्ट्र

धीरे-धीरे बड़े भाई का पारा ऊपर चढऩे लगा। फिर इसी बीच जब बड़ी बहू ने अलग से बुलाकर छोटे देवर को खीर-पूड़ी खिलायी, पति के लिए खरीदे गये कपड़ों में से नयी धोती अथवा चादर देवर को दे दी, उस वक्त पति का क्रोध और भी बढ़ गया। कहने लगा—यह सब तुम्हारी बहुत ज्यादती है। उसे इतना सिर चढ़ा रही हो। पत्नी ने जबाव दिया—अरे, जब तुम यहाँ नहीं थे, तब हमारे लिए कौन काम करता था, तुम अथवा छोटा? देखो ना, वही उस बार तुम्हारे बेटे को भयंकर बुखार आया तब डॉक्टर—कविराज को बुलाना, रात-भर जागते हुए बैठे रहना, दादाजी की सेवा करना—यह सब काम किसने किये थे—तुमने या छोटे भाई ने?बड़ा भाई नाराज होकर बोला—ज्यादा बड़-बड़ मत करो। मैं होता तो मैं करता, और छोटा न होता तो पड़ोसी करते। बीमारी में डॉक्टर-वैद्य के लिए मुहल्ले के लोग भी दौड़-भाग करते। उसके लिए उस निकम्मे को सिर पर बैठाने की इतनी कोई जरूरत नहीं है।

पत्नी ने जवाब दिया—कोई किसी को सिर पर नहीं बैठाता है। वह अपनी करनी त्याग, सहनशीलता के कारण परिवार का सिरमौर बन गया है, मैंने उसे सिर पर नहीं बैठाया है। और रही तुम्हारी बात। तुम्हें तो मैंने सिर पर नहीं चढ़ाया है, तुम तो अपने अहंकार में चिल्लपों मचाकर खुद ही हमारे सिर पर सवार हो गये हो। तो भी तुम्हारे सिर पर सवार होने और छोटे के सिर पर बैठने में बड़ा बेढब अन्तर है।


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