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Dhruvsatya

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ISBN:
81-89914-85-5
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Preface

ध्रुवसत्य 

'ध्रुवसत्य' एक ऐसे संवेदनशील एवं जिजीविषु तरुण की औपन्यासिक गाथा है जो असमय ही तरुणावस्था और वयस्कता के बीच के दुखदायी संक्रमण-काल से गुजर रहा है।

बाल्यकाल से ही परिवार की छाया से वंचित सोलह-सतरह बरस का समुन्दर दिल्ली के गली-कूचों में भटकता फिरता है। भयंकर बेरोजगारी की पांत में बैठकर दानी सेठ-सेठानियों की बाट जोहता है और रातें बिताता है शहर के बदनाम वेश्यालय के निकट बने ऊँटगारियों के सायबान के नीचे। 

इस विकट स्थिति में उसे सहारा मिलता है 'कनफाड़ा' नामक ट्रक ड्राइवर से जो समुन्दर की तरह ही पारिवारिक संबंधों से वंचित है और वेश्यागामी है। जीवन की कड़वाहटें झेलनेवाला यह अनपढ़ आदमी समुन्दर में अपने बेटे की झलक देखता है और उसकी ज़िन्दगी में उद्धारक बन कर आता है और उसे जीवन-संघर्ष के लिए प्रेरित करता है।

संयोगवश समुन्दर सरकारी दफ्तर में नौकरी पा जाता है। बड़ा संयोग यह कि दफ्तर में ऐसा माहौल है कि कच्ची उम्र में जीवन के कटु अनुभवों से गुजरनेवाले समुन्दर जैसे संवेदनशील तरुण के भीतर रचनात्मक ऊर्जा प्रस्फुटित होने लगती है। कहना न होगा कि साहित्यिक कर्म में प्रवृत्त होने के लिए उदग्र एक उदीयमान लेखक के उठते कदमों की प्रसव-पीड़ा की सच्ची और अप्रतिम गाथा है 'ध्रुवसत्य'। इस उपन्यास में सहज बुनावट तो है पर बनावट नहीं।


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