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Dronacharya

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ISBN:
978-81-89962-26-5
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Preface

द्रोणाचार्य 

महाभारत के छह वरिष्ठ व्यक्तियों में द्रोणाचार्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे एक अप्सरा की सन्तान थे। ब्राह्मण होने के बावजूद द्रोणाचार्य क्षत्रियों जैसी अस्त्रवृत्ति ग्रहण करके हस्तिनापुर के राजमहल में जीवन निर्वाह के लिए आचार्य पद पर सुशोभित रहे। वे जिस तरह वेदविद्या और ब्रह्मविद्या के जानकार थे, वैसे ही वे अस्त्रविद्या के भी ज्ञाता थे। कौरव-पाण्डवों को उन्होंने समान शिक्षा दी मगर श्रेष्ठ धनुर्धर विद्यार्थी होने के कारण अर्जुन के प्रति तथा उसके माध्यम से पाण्डवों के प्रति उनका प्रेम कुछ ज्यादा ही प्रगाढ़ रहा; इसके बावजूद द्रोणाचार्य कौरवों के साथ पूरी निष्ठा से जुड़े रहे। द्रयोधन की हठधर्मिता के चलते उनको कई बार न्याय-नीति की अवहेलना भी करनी पड़ी। जीवन के अन्तिम दिन तक कौरवों के यहाँ  रहते हुए उन्हीं के हित के लिए मृत्यु का वरण करने में उनकी चरम निस्वार्थता दिखाई देती है।

द्रोणाचार्य के जीवन में उतार-चढ़ाव बहुत आये। उन्हें तमाम तकलीफें भोगनी पड़ीं और निरन्तर अपमान भी। मगर विपरीत स्थितियों में भी सिर उठाकर जीने की कला में वे माहिर थे। कौरवों के अन्याय के एक भागीदार होने के बावजूद उन्होंने मन से कभी कौरवों का समर्थन नहीं किया और जीवन-भर पाण्डवों का भला चाहते रहे तथा दुयोüधन द्वारा तिरस्कृत किये जाने के बावजूद अर्जुन का गुणगान करते रहे। यह उनकी कूटनीति और राजनीति में निष्णात होने के कारण संभव हुआ। इसी के चलते कौरव राजवंश में उनकी मर्यादा पर आंच नहीं आयी।

बाहरी तौर से देखने पर द्रोणाचार्य के व्यक्तित्व में अजब विरोधाभास नज़र आता है। उनका व्यक्तित्व जटिलताओं से भरा लगता है। उनके चरित्र के इन्हीं उतार-चढ़ावों और मनोभावों की व्याख्या, आधुनिक दृष्टि से, महाभारत के संवेदनशील तथा तथ्यपरक व्याख्याकार बांग्ला-संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान नृसिंहप्रसाद भादुड़ी ने अपनी इस पुस्तक में किया है। महाभारत को समझने के लिए इस पुस्तक का महत्त्व असन्दिग्ध है।


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