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Gaban

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Rs 125.00
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ISBN:
81-89850-87-3
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Preface

गबन 

'गोदान' की तरह 'गबन' भी हिन्दी साहित्य की धरोहर है। औरतों की आभूषण-प्रियता और पुरुषों की प्रदर्शन-प्रियता अनजाने ही उन्हें ऐसे मकड़जाल में उलझा देती है, जिससे कोई निजात नहीं। यह भटकाव उसे समझौतापरस्त बनाते हुए निरन्तर स्खलन की ढलान में उतारता रहता है। नायक रामनाथ पत्नी के गहने चुराता है, सरकारी रुपयों का गबन करता है, देशभक्तों के विरुद्ध मुखबिरी करता है। उपन्यास अपनी पड़ताल में पुलिस-तन्त्र के चरित्र को भी अपनी जद में लेता है और मूल्य के टूटने और मध्यवर्गीय भटकाव को व्याप्त देता है। दूसरी और पतिता समझी जाने वाली वेश्या जोहरा लालच और स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी की रक्षार्थ अपना जीवन तक विसर्जित कर देती है।

एक तरह से देखें तो 'गबन' उपभोक्तावादी समय से त्राण पाने की दिशा में एक प्रतिरोधी स्वर बनकर हमारे वर्तमान का 'विज़न' बन जाता है।


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