Loading... Please wait...

Gandharv Parv

RRP:
Rs 120.00
Your Price:
Rs 90.00 (You save Rs 30.00)
ISBN:
81-89914-67-7
Author:
Cover:
Quantity:
Bookmark and Share


Preface

गान्धर्व 

स्त्री का प्रेम में होना, मछली के जाल में रहने का हठ पकड़ ले में नहीं, विशेषकर जब मछली जल में ही जीने का हठ पकड़ ले। नारी चाहे पिछले किसी युग की हो या आज की, प्रेम उसके लिए एक सूक्ष्म देहरी-लांघन होकर आता है जिसके पश्चात्,

जाने कौन अरण्य बदा हो

नारी के जीवन में

अपनी जातीय-स्मृति के कारण स्त्री जानती है कि प्रेम में देहरी-लांघन की

इस लीला के बाद

नहीं घर,

न मात-पिता

न संगी, संग होंगे।

सुनीता जैन का गान्धर्व पर्व नारी की इस करुण नियति का एक ऐसा क्लासिक प्रस्तुत करता है जो स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में,  आने वाले वर्षों में लम्बे समय तक वैचारिक विनिमय और बहसों के केन्द्र में होगा, क्योंकि गान्धर्व पर्व की शकुन्तला केवल अनाघ्रात ऋषिकन्या नहीं जो एक आगन्तुक युवक को देख देह समर्पण कर दे और उसका रचयिता उसके भीतरी ऊहापोह की ओर संकेत भी न करे। पुरुष लेखकों द्वारा प्रेम के इस सरलीकृत व्यापार-वर्णन से सुनीता जैन को सदा आपçत्त रही है। गान्धर्व पर्व शकुन्तला के परिणय से पहले, उसकी गहरी नैतिक छटपटाहट चित्रित कर अन्तत: उसके दुस्साहसिक निर्णय को विश्वसनीय तो बनाता ही है, साथ ही नारी मन की परतों का एक ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत करता है जो स्वयं सुनीता जैन की कविता में एक नया बेंचमार्क है। सुनीता जैन ने अपनी समकालीन कवयित्रियों की तरह प्रेम के प्रति फैशनेबल उपेक्षा-मुद्रा नहीं अपनायी। कविता में उनका वाचक (पसोना) प्रेम से होने और प्रेम खोने—दोनों स्थितियों को आत्म-निरीक्षण और आत्म-परीक्षण का अवकाश देता है। शकुन्तला इसी अवकाश की नयी और न भुलाई जानेवाली मांसल उपस्थिति है।


Find Similar Books by Category


You Recently Viewed...