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Godan / Gaban

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Rs 650.00
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ISBN:
81-89850-63-6
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Preface

गबन

'गोदान' की तरह 'गबन' भी हिन्दी साहित्य की धरोहर है। औरतों की आभूषण-प्रियता और पुरुषों की प्रदर्शन-प्रियता अनजाने ही उन्हें ऐसे मकड़जाल में उलझा देती है, जिससे कोई निजात नहीं। यह भटकाव उसे समझौतापरस्त बनाते हुए निरन्तर स्खलन की ढलान में उतारता रहता है। नायक रामनाथ पत्नी के गहने चुराता है, सरकारी रुपयों का गबन करता है, देशभक्तों के विरुद्ध मुखबिरी करता है। उपन्यास अपनी पड़ताल में पुलिस-तन्त्र के चरित्र को भी अपनी जद में लेता है और मूल्य के टूटने और मध्यवर्गीय भटकाव को व्याप्त देता है। दूसरी और पतिता समझी जाने वाली वेश्या जोहरा लालच और स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी की रक्षार्थ अपना जीवन तक विसर्जित कर देती है।

एक तरह से देखें तो 'गबन' उपभोक्तावादी समय से त्राण पाने की दिशा में एक प्रतिरोधी स्वर बनकर हमारे वर्तमान का 'विज़न' बन जाता है।

गोदान

विश्व कथा-साहित्य के दिग्पाल प्रेमचन्द की अमर कृति 'गोदान' हिन्दी का गौरव ग्रन्थ है। नायक होरी, पत्नी धनिया, पुत्र गोबर, बेटियां-सोना, रूपा, भाई हीरा, के साथ ही भोला, झुनिया सिलिया, दातादीन, मातादीन, रायसाहब, मेहता साहब, मालती एक से बढ़कर एक चरित्र, एक से बढ़कर एक स्थितियां, जिनका 'समग्र' स्वाधीनतापूर्व भारत के खेतिहर ग्राम्य समाज का दस्तावेज है। जिस देश में एक आम किसान हाड़ तोड़ मेहनत करने के बावजूद अपनी एकमात्र साध (एक गाय पोसना) को मृत्युपर्यन्त पूरा नहीं कर पाता, वहीं वैतरणी पार करने के लिए उससे गोदान कराया जाता है। ऐसे कितने विडम्बनापूर्ण अंतर्विरोध, उनकी नेकी, उनकी बदी, उनके उल्लास, उनके विपर्यय, कितने रंग, कितने शेड्स, कितनी धार और उन सबका एक बृहत् कोलाज है गोदान जो पाठक को मर्माहत भी करता है और आहत मन को इसके पार जाने को प्रेरित भी करता है। 


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