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Gogolchikkus Nagaland mein

Price:
Rs 145.00
ISBN:
978-81-908653-5-7
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Preface

गोगोल चिक्कुस नागालैण्ड में

चिक्कुस की नस्ल का नाम है लासा पपि। तिब्बत की राजधानी है लासा। मामा के दोस्त उस नेपाली सज्जन ने चिक्कुस के पुरखों की जानकारी देते वक्त तिब्बती कहा था। बर्फ से ढके हिमालय क्षेत्र के जीव होने की वजह से उनके बदन पर वैसे झब्बेदार रोयें हैं। बड़े-बड़े रोयें तो बहुत सी नस्ल के कुत्तों के होते हैं, पर लासा पपियों का झबीला रोयाँ उनके सारे बदन को ढाँपकर बरगद की जटाओं सा नीचे की तरफ उतरा हुआ है। चमचमाते सफेद रोयें में,बस तीन काली बिन्दी दिखायी पड़ती हैं। इन तीन बिन्दियों में तो दो आँखें हैं और तीसरी नाक। इसके अलावा पूरा शरीर सफेद झब्बीले रोयें से ढका है। जंग,सोनदा और गोल्डी की भौंहों के ऊपर की रोओं को बीच-बीच में छाँट देना पड़ता है! वरना भौंहों के रोयें जिस तरह दोनों आँखों को दाबे रहते हैं, उनका देख पाना ही मुश्किल है।

गोगोल चिक्कुस को देखते ही समझ गया था कि यह बात गलत नहीं है। बस,छ:हफ्ते की उम्र में ही लटके कान और रोएँदार चेहरे पर उन तीन काली बिन्दियों के सिवा कुछ नजर नहीं आता था। कुछ भी नजर नहीं आता था,यह कहना शायद गलत रहेगा क्योंकि कभी-कभार उसकी गाढ़ी लाल जीभ और नये उगे सफेद चमकीले दाँत-दिख जाते थे। लम्बे लटकते कान शायद कनटोपे (मफलर) का काम करते थे। सर्द बर्फीले देश के प्राणी होने की वजह से शायद प्रकृति ने उनके बड़े-बड़े रोयेंदार झबरीले कानों को इस तरह दोनों तरफ से लटकाया था कि जिससे कानों के अन्दर सर्दी न जा पाए। मतलब,लासा पपियों के घने झबरीले लम्बे रोयें उनके लिए गर्म फर के कोट से भी ज्यादा आरामदेह हैं। कपड़े पहनने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती।


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