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Guptdhan / Kabuliwala

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ISBN:
81-89850-42-3
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Preface

गुप्तधन / काबुलीवाला 

अमावस्या की अँधेरी रात थी। मृत्युंजय अपनी कुलदेवी जयकाली की पूजा कर रहा था। जब वह पूजा खत्म करके उठा, तब भोर होनेवाली थी। करीब की अमराई से एक कौआ कांव-कांव कर उठा।

मृत्युंजय ने पीछे मुड़कर देखा, मन्दिर का द्वार उसी तरह बन्द था। तब उसने एक बार देवी के चरणों में प्रणाम करके उनका आसन हटा दिया। उस आसन के नीचे कटहल की लकड़ी का एक बक्स था, जिसकी चाबी उसकी जनेऊ में बंधी थी। उस चाबी से, मृत्युंजय ने उस बक्स को खोला। उसके खुलते ही वह चौंक गया। उसमें रखा कागज गायब था। उसने घबड़ाहट में अपने माथे पर हाथ मारा।

मृत्युंजय का भीतरवाला बागीचा चारदीवारी से घिरा था। उस बागीचे में एक किनारे बड़े-बड़े वृक्षों की छांह के अँधेरे में यह छोटा-सा मन्दिर बना था। मन्दिर में जयकाली की मूर्ति के अलावा और कुछ नहीं था। मन्दिर में जाने के लिए एक ही दरवाजा था। मृत्युंजय ने उस बक्स को काफी देर तक हिला-डुलाकर देखा, मगर उसमें कुछ भी नहीं था। परेशान होकर उसने मन्दिर का दरवाजा खोला। उस वक्त सुबह हो रही थी। मन्दिर के चारों तरफ मृत्युंजय उस कागज को ढूँढने का असफल प्रयास करने लगा। 

 


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