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Hindi Sahitya Ka Sankshipt Itihas

RRP:
Rs 150.00
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ISBN:
978-81-89962-42-5
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Preface

हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 

यह हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक इसलिए है कि इसमें केवल हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास लिखने की प्रवृति नहीं है। हिन्दी साहित्य के पुराने इतिहास लेखक अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार उन तथ्यों और बदलावों को छोड़ते चले गये जो नये शोधों में स्थान नहीं पा सके थे। इस इतिहास में सिद्ध साहित्य से लेकर आधुनिक साहित्य तक कुछ नये परिवर्तन पाये जायेंगे। हिन्दी साहित्य की उच्चतम शिक्षा लेने वाले भी इन नये तथ्यों और नयी तलाशों से अनभिज्ञ थे। भरतमुनि के प्रथम श्लोक को भी महत्त्व नहीं दिया गया था जिसमें उन्होंने लिखा था—क्वन वेद व्यवहार्यो अयं सेर्वेषु शूद्रजातिषु। तस्मात् सृज अपरं वेदं पंचम सार्वर्निकम्॥

शताब्दी पूर्व लिखी गई इस चुनौती को विशेष वर्ग के लोगों ने नज़रअन्दाज कर दिया था, 'सृज अपरं' चुनौती को स्वीकार करके हिन्दी साहित्य का यह इतिहास लिखा गया है।

हालांकि हिन्दी साहित्य की इस पुस्तक को संक्षिप्त इतिहास कहा गया है, परन्तु यह पृष्ठों में भले ही कम हो, हिन्दी साहित्य का इतिहास जानने के लिए संक्षिप्त नहीं है। यह विश्वास किया जाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास (सबाल्टर्न एज से साइबर एज तक) के प्रति पाठकों की रुचि बढ़ेगी।


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