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Jaybaba Phelunath

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ISBN:
81-89850-56-3
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Preface

रंकिणी देवी की तलवार 

मेरे जीवन में भी एक बार ऐसी ही घटना घटी थी, जिसका कोई वैज्ञानिक कारण न तब मेरी समझ में आया था, न अब आया है। इसीलिए पाठकों के सामने उसे रख रहा हूँ। अगर पाठक उस रहस्य का कोई सही कारण बता सकें तो मुझे बेहद खुशी होगी।

 वही घटना मैं सुना रहा हूँ।

कई साल पहले की बात है। मैं उन दिनों मानभूम जिले के चेरो गाँव में छोटे बच्चों के एक स्कूल में पढ़ाता था।

मैं पहले ही यह बता दूं, चेरो गाँव का प्राकृतिक दृश्य इतना सुन्दर था कि वहा¡ कुछ दिन बिता लेने पर बंगाल का कोई भी एकरस मैदानी गाँव अच्छा नहीं लगेगा। वह पूरा गाँव एक छोटे पहाड़ की ढलान पर लम्बाई में बसा हुआ था। कतार के आखिरी मकान की खिड़कियां खोल देने पर पहाड़ की चोटी पर खड़े शाल, महुआ, कुरीच, बेल के इकहरे जंगल, एक पक्के चबूतरेवाला विशालकाय बरगद का पेड़, छोटे-बड़े शिलाखण्ड और कंटीली झाड़यां, सब आँखों के सामने नज़र आने लगते थे।

उस गाँव में जाने के कुछ ही दिनों बाद एक दिन पहाड़ पर घूमते-घूमते अचानक एक जगह शालवनों के बीच पत्थर के बने एक मन्दिर के खण्डहर पर मेरी नज़र पड़ी।

मेरे साथ दो छात्र भी थे, जो कुछ ऊंची कक्षा में पढ़ते थे। वे दोनों मानभूम के रहनेवाले बंगाली थे। यहाँ एक बात बता दूं, चेरो गाँव के ज्यादातर निवासी दक्षिण भारतीय थे। हालाँकि वे लोग बांग्ला बढ़िया बोलते थे और उनमें से ज्यादातर लोगों ने बंगाल के तौर-तरीकों को भी अपना लिया था। किस तरह मानभूम जिले के उस स्थान में एक साथ इतने सारे दक्षिण भारतीय आकर बस गये थे, इसके बारे में मेरी कोई जानकारी नहीं है।


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