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Kala chor Gora chor

Price:
Rs 30.00
ISBN:
978-81-89962- 97-5
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Preface

काला चोर गोरा चोर

मेरे बाबूजी इतवार की सुबह बाजार से पहले हफ्तेभर का सामान खरीद लाते हैं। एक थैले में सब्जियाँ होती हैं, दूसरे थैले में मछलियाँ। बाजार से लौटकर पिताजी रसोईघर के सामने उन दोनों थैलों को रखकर बाथरूम में हाथ धोने चले गये। तभी उन थैलों को किसी ने गिरा दिया। एक थैले से मछली छिटककर बाहर आ गयी। पलक झपकते ही सफेद रंग की कोई चीज बिजली जैसी कौंधकर उस मछली को मुँह में दबाये गायब हो गयी।

मैं थोड़ी दूर पर ही खड़ा था। पहले तो मैं भी भौचक्का रह गया। वह बिल्ला कहाँ छिपा था? क्या उसे पता था कि बाबूजी अभी बाजार से लौटकर थैलों को रसोई के सामने रखेंगे? या फिर धक्का देते ही थैलों से एक मछली छिटककर बाहर निकल आएगी?

गोरे बिल्ले को सीढिय़ों से होकर छत की तरफ भागते देखा तो मैंने भी उसका पीछा किया। मगर वह मेरी आँखों में धूल झोंककर गायब हो गया। मैंने हर जगह छान मारा निराशा ही हाथ लगी। तो क्या बिल्लियाँ गायब भी हो सकती हैं? या फिर उतनी ऊँची छत से कूद सकती होंगी?

इस तरह इन दोनों चोरों के उपद्रव से हम लोग परेशान हो गये थे। वह बागड़बिल्ला अगर पहरे पर होता तो गुण्डा कौआ कुछ और चीज उठाकर ले जाता। अगर बरामदे में बैठकर में कौए पर निगाह रखता बिल्ला आकर मछली की सब्जी की कड़ाही ही उलट देता।


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