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Kankal / Titli

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ISBN:
81-89850-32-6
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Preface

 

कंकाल / तितली 
जय शंकर प्रसाद के उपन्यासों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया जबकि उनका उपन्यासकार उनके कवि ओर नाटककार की तरह अतीतजीवी और रोमाçण्टक नहीं बल्कि इतना प्रगतिशील और आधुनिक खयालों का है कि कभी-कभी आश्चर्य होता है कि क्या ये दोनों एक ही व्यçक्त हैं।
अपने उपन्यास  में प्रसाद जी ने धर्म के नाम  पर हो रहे, दमन, शोषण, भेदभाव और पाखण्ड, çस्त्रयों के प्रति बरती जाने वाली अमानवीयता और रूढ़ियों के  विरुद्ध युगीन सच्चाइयों से रू-ब-रू कराया  है डॉ. पुष्पपाल सिंह की विद्वतपापूर्ण भूमिका के साथ प्रस्तुत है प्रसाद जी के दो उपन्यास क्वकंकालं और क्वतितलीं!

कंकाल / तितली 


जय शंकर प्रसाद के उपन्यासों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया जबकि उनका उपन्यासकार उनके कवि ओर नाटककार की तरह अतीतजीवी और रोमाçण्टक नहीं बल्कि इतना प्रगतिशील और आधुनिक खयालों का है कि कभी-कभी आश्चर्य होता है कि क्या ये दोनों एक ही व्यçक्त हैं।
अपने उपन्यास  में प्रसाद जी ने धर्म के नाम  पर हो रहे, दमन, शोषण, भेदभाव और पाखण्ड, çस्त्रयों के प्रति बरती जाने वाली अमानवीयता और रूढ़ियों के  विरुद्ध युगीन सच्चाइयों से रू-ब-रू कराया  है डॉ. पुष्पपाल सिंह की विद्वतपापूर्ण भूमिका के साथ प्रस्तुत है प्रसाद जी के दो उपन्यास क्वकंकालं और क्वतितलीं!

 


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