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Kankal

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ISBN:
81-89850-89-X
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Preface

कंकाल 

जयशंकर प्रसाद के उपन्यासों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया जबकि उनका उपन्यासकार उनके कवि और नाटककार की तरह अतीतजीवी और रोमांटिक नहीं बल्कि इतना प्रगतिशील और आधुनिक खयालों का है कि कभी-कभी आश्चर्य होता है कि क्या ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं।

अपने उपन्यास में प्रसाद जी ने धर्म के नाम पर हो रहे दमन, शोषण, भेदभाव और पाखण्ड, स्त्रियों के प्रति बरती जाने वाली अमानवीयता और रूढ़ियों के विरुद्ध युगीन सच्चाइयों से रू-ब-रू कराया है। डॉ पुष्पपाल सिंह की विद्वतापूर्ण भूमिका के साथ प्रस्तुत हैं प्रसाद जी के दो उपन्यास 'कंकाल' और 'तितली'!


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