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Katha Samagra (Doodhnath Singh)

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Rs 600.00
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ISBN:
81-89850-67-9
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Preface

कथा समग्र : दूधनाथ सिंह 

अकसर ये कहानियां 'पाठ' और पारिभाषिक शब्दालियों को नकारती हैं। शब्द-चिप्पियोंवाली परिभाषाओं को धक्का देती हैं। ये कहानिया¡ 'अकेलेपन' की खाली चर्चाओं से अलग 'अकेले न हो सकने' की क्रूर अनिवार्यता का एहसास ज्यादा कराती हैं। जीवन की कई-कई तहों को एक साथ टटोलती हुई आपके हाथों में सूत्रों के कई-कई छोर एक ही साथ पकड़ा देती हैं। एक तीव्र और प्रशान्त शिल्प के सहारे आपकी बनी हुई (सु) 'रुचि' को नष्ट करने को तत्पर दीखती हैं। यदि आप भाषा की सपाट काव्यमयता के भीतर 'कथ्य' के समानान्तर चलते एक दूसरे 'अन्तरंग अभिप्राय' को पकड़ लें, तो अचानक आपको अपनी ही आँखों में वह दरार दिख जाएगी, जिसके अन्दर से आप भारतीय जीवन के आन्तरिक 'ऑस' से साक्षात्कार कर सकेंगे। तब आप पाए¡गे कि ये कहानियां आपको किसी 'सुखद अनुभव' तक न ले जाकर, वहाँ पहुँचती हैं, जहाँ आप सहसा अत्यन्त बेचैनी महसूस करने लगते हैं।

रचना के क्षेत्र में हर मौलिक और ईमानदार रचनाकार को अपनी ही स्वनिर्मित, स्व-अर्जित रचनात्मक समृद्धि की चुनौती स्वीकार करनी पड़ती है। अपनी रचनाओं की प्रतिद्वंद्विता में उठ खड़ा होना ही उसकी नियति है। रचनात्मकता के भीतर की यह 'अनिवार्य असंगति' ही रचनात्मक तेजस्विता की पहचान है। 'कथा-समग्र' का दूसरा भाग इसी 'अनिवार्य असंगति' का प्रतिफल है। सन् 1972 के बाद एक लम्बा अन्तराल है, जो कथाकार के 'नये निर्माण' का मौन काल है। फिर 1990 से कथा का दूसरा तेवर शुरू होता है। यह जाने-अनजाने दोनों रूपों में घटित हुआ। इन कहानियों में विविधवरणी लोक-रंगों का प्रवेश हुआ और भाषा में रचनात्मक तोड़-फोड़ शुरू हुई। इस रचनात्मक तोड़-फोड़ में भाषा के की रूप-रंग उभरकर आये। 'माई का शोकगीत', 'काशी नरेश से पूछो' और 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे' कहानियां इसी दौर की उपलब्धियाँ हैं, जो बार-बार वर्षों तक लिखी-रची जाती रहीं।

यह कथा-समग्र फन और फैशन से अलग कथाकार के रचनात्मक व्यक्तित्व से मुहरबन्द है।


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