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Khawbaro / Nadeed

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ISBN:
81-89850-43-1
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Preface

ख़्वाबरौ 

राजनैतिक बंटवारे मनुष्य के दिलों को नहीं बाँट सकते। लखनऊवाले कराची (पाकिस्तान) गये तो एक लखनऊ अपने दिलों में लेते गये और वहाँ कर उसे रोप दिया। गोया वे कहीं आये-गये नहीं, आना जाना तो टूरिस्टों का काम है। लखनऊ तो उनकी रगों में, साँसों में, प्राणों में बसता है सो लखनऊ से चलकर लखनऊवाले फिर लखनऊ ही पहुंचते हैं।

शरणार्थियों, मुहाजिरों पर उर्दू की फन्तासी के फनकार जोगिन्दरपाल का मानवीय अर्थवत्ता को उजागर करनेवाला एक मर्मस्पर्शी उपन्यास।

नादीद

इस उपन्यास में भोला, शरफू, रतने, रोमी, बाबा आदि कुछ अन्धे चरित्रों के बहाने लेखक ने फन्तासी के आलंबन के सहारे बातों की जड़ें उखाड़ने और बोने के क्रम में मौजूदा सत्ता और व्यवस्था के अंधेरों की पड़ताल की है।

फन्तासी के प्रतिपल बदलते रंगों का केलेडेस्कोप, अन्धत्व या नादीदेपन की इतनी व्यापक व्यंजनाये हो सकती हैं, यह इस विलक्षण कृति से गुजरे बिना नहीं जाना जा सकता। एक बेहद उम्दा काव्मय गद्य जिसे आप बार-बार पढ़ना चाहेंगे।


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