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Khel

RRP:
Rs 250.00
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ISBN:
81-89850-77-6
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Preface

खेल 

गुजरी सदी के आखिरी बरसों में उभरे अभिषेक कश्यप हिन्दी साहित्य की नयी कथा-पीढ़ी के प्रतिनिधि कथाकार हैं। अपनी मुट्ठीभर कहानियों से ही इन्होंने समकालीन हिन्दी कथा-परिदृश्य में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है। अभिषेक अपनी कथा-रचनाओं में सूक्ष्म रचनात्मक अन्तदृष्टि से देश के किशोरों और युवाओं के बाह्यजगत व अन्तर्जगत का बहुविध कोलाज रचते नज़र आते हैं। वाद-विवाद, विमर्श और विचारधाराओं के तुमुल कोलाहल से परे इन कहानियों में हमारे देश की नयी पीढ़ी के सपनों, आकांक्षाओं, उलझनों, भटकावों, यौन संबंधों की जटिलताओं और प्यार न मिल पाने की गहरी टीस के कई रंग, कई शेड्स बिखरे पड़े हैं। परिवेश की नाटकीयता, रागात्मक कथा-दृष्टि और गतिशील रचनाशिल्प इन कहानियों की खासियत है।

विश्वास है, ये कहानियां पाठकों को चमत्कृत या आतंकित नहीं करेंगी, बल्कि 'अपनी' लगेंगी, जैसा कि अरुंधति रॉय कहती हैं—'महान कहानियों का सबसे बड़ा रहस्य यही होता है कि उनका कोई रहस्य नहीं होता। वे घर या प्रिय की देहगन्ध की तरह हमारी 'अपनी' होती हैं।'


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