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Khuki Ke Karname / Barshel Ki Badnasibi

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ISBN:
81-89850-99-7
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Preface

खुकी का कारनामा 

बीच-बीच में वह माँ के साथ लड़ने भी लगती थी। चार साल की थी तो क्या हुआ, खाना न खाने के कारण हाथ-पैर सींक समान थे तो क्या हुआ, उसे काबू में करने के लिए उसकी माँ को आये दिन पसीना आ जाता था। माँ नाराज होकर कहती, 'रहने दो इस आफत की पुतली को, यह नहीं खाती तो मेरी बला से। दिनभर मेहनत करते-करते खून-पसीना एक हो जाता है, इस पर इस दुष्ट लड़की के साथ दिन में पांच बार कुश्ती लड़ते हुए दूध पिलाने की ताकत मुझ में नहीं रही...बिना खाये-पिये मरे।''

खुकी की जान बचती। वह एक दौड़ में घर के सामने के आमतला में खड़ी होकर अपनी हमउम्र सहेली को पुकारती—'ओ नेनू उ...उ...'

उसके पिता ने एक दिन घर में कहा, ''खुकी को आज पन्द्रह दिनों से ठीक से देखा नहीं, लौटते समय देखता हूँ कि वह रास्ते में खेल रही है, इतनी कमजोर हो गई है कि पहचानी नहीं जाती, उसकी पीठ पतली हो गई है, गले की हड्डी उभर आयी है, उसे कोई बीमारी भी नहीं है, फिर भी दिनोन्दिन इस तरह से कमजोर क्यों होती जा रही है, बता सकती हो?''


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