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Koyal Ke Nikat

RRP:
Rs 250.00
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ISBN:
978-81-89962-69-2
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Preface

कोयल के निकट 

बुद्धदेव गुहा ऐसे समर्थ रचनाकार हैं जिन्होंने अछूते वन-प्रान्तरों में जाकर वहा¡ की पटभूमि का अपने उपन्यासों में बेहद रोचक और संवेदनशील चित्रण करके एक निश्चित पहचान बनायी है। उनकी कृतियों में नयी जगह की यात्रा का आनन्द मिलता है और भरपूर रोमांच का भी। झारखण्ड राज्य के पलामू जिले की कोयल नदी के आसपास के वन्य क्षेत्र को उन्होंने इस उपन्यास के जरिये एक नयी गरिमा प्रदान की है। वैसे भी वन जंगल और वन्य पशु बुद्धदेव बाबू के प्रिय विषय हैं।

बुद्धदेव गुहा का स्वयं भी मानना है कि प्रकृति ही उनका पहला प्रेम है और वह स्थायी प्रेम है। उनकी प्रकृति-प्रधान कृतियों में सिर्फ प्रकृति के बाह्य रूप के ही दर्शन नहीं होते बल्कि वे शब्द और गन्ध को न जाने किस जादुई शक्ति से अक्षरों में बन्द कर लेते हैं। उनकी कृतियों में जैसा सम्मोहन मिलता है, वह अन्य लेखकों की पुस्तकों में कम ही दिखता है।

'कोयल के निकट' बुद्धदेव गुहा का बहुचर्चित उपन्यास है। इस उपन्यास में प्रकृति ही अपनी महिमा में दृष्टिगोचर होती है, इसमें सन्देह नहीं; लेकिन इस उपन्यास में वर्णित हर पात्र अपनी जगह विशिष्ट है। मरियाना का प्रेम, सुमिता भाभी की लालसा, लालती की वासना, जगदीश पाण्डे की क्रूरता, घोषदा की कपटता और यशवन्त की आदिमता—सभी नदी की तरह गतिशील और जीवन्त हैं। सौन्दर्य, रोमांच, उत्कण्ठा और आवेग से भरपूर 'कोयल के निकट' का आशा है पाठक स्वागत करेंगे।


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