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Kripacharya

Price:
Rs 110.00
ISBN:
978-81-908653-3-3
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Preface

कृपाचार्य

कृपाचार्य की यह जो व्यक्तित्वहीनता थी,यह कोई एक दिन में निर्मित नहीं हुई थी। कृपाचार्य के जन्म से लेकर जीवन-भर जितनी घटनाएँ घटीं और जिन सब घटनाओं के साथ जो लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े हुए थे, उनका व्यक्तित्व इतना तेजस्वी था कि उनके साथ एक पंक्ति में बैठकर कृपाचार्य के लिए कोई स्वतन्त्र निर्णय लेना सम्भव ही नहीं था। उस स्थिति में वे अपने आपको कैसे व्यक्त कर सकते थे। अगर ऐसा नहीं था तो देखिए जन्म के मामले में उनकी स्थिति विख्यात द्रोणाचार्य से कुछ भिन्न तो थी नहीं। पर,जन्म के बाद द्रोण को अपने पिता का साहचर्य जितना मिला था,कृपाचार्य को उतना नहीं मिल पाया था। जनमते ही वे दूसरे के घर,परान्न से पालित होकर रहने लगे थे। सहज में ही उन्हें खाने को अन्न जुट जाता था इसलिए उनके जीवन में कोई संघर्ष तो था ही नहीं, इसलिए यातना की कोई आग भी नहीं थी, पर द्रोणाचार्य के जीवन में यातना की ज्वाला थी, गरीबी की पीड़ा विवाह के बाद भी उनका पीछा करती हुई उन्हें भटका रही थी। जिन्दगी की पीड़ा एवं उसके साथ संघर्ष,अन्त में उनके व्यक्तित्व का विकास कर देते हैं।


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