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Kshma

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ISBN:
81-89914-68-5
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Preface

क्षमा 

सुनीता जैन का कविता संग्रह क्षमा पढ़ना अध्यात्म और काव्य के क्षमासागर में उतरते हुए कविता की अन्तरात्मा पहचानने जैसा है। नारी के जो बिम्ब इस संग्रह में रखे गये हैं उनसे भारतीय नारी की किसी सांस्कृतिक यशोगाथा के बजाय नारीत्व के उस रूप की पहचान होती है, जहा¡ नारी का क्षमा रूप उसके बिम्बों से पार जाकर नारी को न केवल क्षमामयी बनाता है, बल्कि उसे क्षमा में ही रूपान्तरित कर देता है।

स्त्री पर लिखी गई आज तक की समस्त कविताओं में नारी का यह क्षमा रूप, सुनीता जैन की कविता का ऐसा अन्वेषण है जिसे न तो हम महादेवी के दीपक की कल्पना से जोड़ सकते, न छायावादी राग प्रवृçत्तयों से, बल्कि एक ऐसे नारीत्व से जोड़ पाते हैं जो पुरुष के भीतर भी नारी के रूप में मौजूद है। राधा, द्रौपदी, सीता, रत्नावली, तुलसीदास, तुकाराम मात्र नाम नहीं हैं, न हमारी स्मृतियों के अवकाश में हस्तक्षेप करते कोई पात्र; वे तो ऐसे मनोबिम्ब हैं जो मनुष्य की मानसचेतना में सदैव बने रहते हैं। ये कविताए¡ अतीत और वर्तमान के सौन्दर्य बोध से टकराती हुई भविष्य के मियक रचती हैं। इन्हें पढ़ना ऐसा लगता है, जैसे मनुष्य अपने ही संवेदन भाव की काव्यगाथा पढ़ रहा हो।

स्त्री यहाँ देह में देहमुक्त है और आत्मा से एक नये अध्यात्म की सृष्टि करती है। ईश्वरीय अध्यात्म तो भक्तिकाल की सन्त और सूफी कविताओं तक व्याप्त है, लेकिन सुनीता जैन की कविताओं ने नारी का अध्यात्म रचकर नारी की जो छवि रची है उसमें क्वक्षमां का एक नया ईश्वर प्रतिष्ठत है।


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