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Lakarsunghwa

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ISBN:
81-89914-16-2
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Preface

लकड़सुंघवा 

हीरू वहाँ से सीधे राईपुर गया। वहाँ गरीब मुसलमानों की एक बस्ती थी। मुहर्रम के वक्त वे लोग बड़ी-बड़ी लाठियां  भांजते हुए ताजिया निकालते थे। उनकी लाठिया¡ तेल से चुपड़ी होती थीं और लाठियों के गांठों में पीतल मढ़े हुए रहते। इसी से काफी लोगों का खयाल था कि उन जैसा लाठी भांजनेवाला उस पूरे क्षेत्र में और कोई नहीं था। ऐसा कोई काम नहीं था जो वे नहीं कर सकते थे। बस पुलिस के डर से चुप बैठे रहते थे।

 हीरू ने जाकर कहा, 'बड़े मियां, यह अगि्रम दो रुपये रख लो। तुम्हारे और तुम्हारे भाई का। मेरा काम कर दोगे तो और इनाम मिलेगा।''

 दो रुपये हाथ में लेकर लतीफ मियां ने हंसकर कहा, 'क्या काम है बाबू?'

 हीरू ने कहा, 'तुम दोनों की जांबाजी को यहाँ कौन नहीं जानता लाठी के बल पर विश्वास बाबुओं की कितनी जमीन्दारी हासिल करायी है। तुम लोग चाह लो तो ऐसा क्या काम है जो नहीं कर सकते।''

बड़े मियां ने आँख दबाकर कहा, धीरे से बोलो बाबू! थाने के दारोगा को पता चलेगा तो फिर खैर नहीं। वीरनगर गाँव हम दो भाइयों ने दखल कराया था, इसे वे जानते हैं। मगर हमें पहचान न पाने के कारण ही उस बार पकड़े जाने से बच गये थे।''

 हीरू ने हैरानी से पूछा, ''कोई नहीं पहचान सका था?''


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