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Mahua Mandal Our Andhera

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ISBN:
81-89914-30-8
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Preface

महुआ माँदल और अँधेरा 

झारखण्ड के एक उपेक्षित जिले पलामू की पृष्ठभूमि पर प्रस्तुत कहानियों का संग्रह है 'महुआ, माँदल और अँधेरा'।

पलामू, अर्थात् नो-मैन्सलैण्ड! पलामू यानी मृत्यु की उपत्यका! पलामू, यानी वह अँधेरा पठार जहां चट्टानें आदमी को निगल सकती हैं और जहाँ कौवे को भी बुखार लगता है।

महुआ के फूल इस पलामू के वर्षा-वंचित पठार की जीवन-रेखा हैं। मनुष्य से मवेशी तक का जीवन रक्षक आहार! माँदल की धुन है वन-जीवन को सींचने वाला राग-रस, अरण्य का जीवन-संगीत...और अ¡धेरा है पलामू के हाशिये पर जीते-मरते लोगों के जीवन में व्याप्त भूख, शोषण, अज्ञान, बेरोजगारी, अशिक्षा, विपन्नता और विस्थापन का...।

हरे सोने की रत्नगर्भा धरती पर उगी इन कहानियों में लोक-जीवन का रूप है, रस है, गन्ध है। दुख-सुख और रीति-रिवाज हैं। लोक परम्पराएँ और संस्कृति-संस्कार हैं। और है वन-जीवन का संघर्ष और अमर्ष।

आदिवासी जन-जीवन पर लिखने वाले साहित्यकारों में पिछले दिनों बहुत तेजी से उभरकर आये प्रखर युवा रचनाकार राकेश कुमार सिंह के इस कहानी-संग्रह 'महुआ माँदल और अँधेरा में 'महुआ, माँदल और अँधेरा' शीर्षक से कोई कहानी नहीं है। यह शीर्षक वस्तुतज् पलामू के 'लोक' का रूप है। यह शब्दबन्ध वस्तुतज् एक अन्तर्धारा है जो इस संग्रह में संयोजित हर कहानी में उपस्थित है।


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