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Mangal Pandey Ka Mukadma

RRP:
Rs 180.00
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ISBN:
81-89914-62-6
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Preface

मंगल पाण्डे का मुकदमा 

सन् 1857 के आदि विद्रोही के रूप में मंगल पाण्डे का नाम आज जाना-पहचाना है। मंगल पाण्डे की लोकप्रियता का हाल यह है कि उन पर न जाने कितने लोक गीत बने हैं और उनके नाम से सच्ची-झूठी कहानियां  प्रचलित हैं। बंगाल की बैरकपुर छावनी में उनकी चलायी गोली से ब्रिटिश सरकार सकते में आ गई थी। बदले में उसने वहीं बैरकपुर में मंगल पाण्डे पर झटपट मुकदमा चलाकर फा¡सी देने में देर नहीं की। इस पुस्तक में पहली बार उन दिनों का माहौल तथा मुकदमे का विवरण दर्ज है।

बंगाल में अंग्रेजों के खिलाफ एक और जबर्दस्त आन्दोलन हुआ था, नील विद्रोह के रूप में। हिन्दी में नील विद्रोह और नील किसानों की व्यथा-कथा पर ज्यादा सामग्री नहीं मिलती। इस पुस्तक में प्रकाशित लेख से इस सम्बन्ध में नयी जानकारी मिलेगी। इसी तरह से इस पुस्तक में शामिल दो अन्य लेखों—'ऐसे भी डाकू' और 'फांसीबाजार' में विषय से संबद्ध नये तथा रोचक तथ्य मिलेंगे।

इन चारों लेखों का मुख्य विषय है—प्रतिवाद। इन सभी के नायक विद्रोही हैं। उम्मीद है, एक समान मानसिकता वाले ये लेख पाठकों को जरूर आन्दोलित करेंगे और वे इस पुस्तक के महत्त्व को समझेंगे।


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