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Matiyaburj Ka Akhiri Navab

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ISBN:
81-89914-59-6
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Preface

मटियाबुर्ज का आखिरी नवाब 

अंग्रेजों ने भारत में अपना संपूर्ण आधिपत्य कायम करने के लिए जिस तरह की ओछी कूटनीति और रणनीति का सहारा लिया, उसके शिकार लखनऊ के हरदिल अजीज नवाब वाजिद अलीशाह को भी होना पड़ा। अंग्रेजों  के शुभचिन्तक और उनकी अधिकांश शर्तों  को मानने के बावजूद उन्हें लखनऊ की नवाबी से हाथ धोना पड़ा। 13 मार्च 1856 को वे भूतपूर्व नवाब के रूप हमें हमेशा के लिए लखनऊ छोड़कर कलकत्ता के मटियाबुर्ज इलाके में अंग्रेजी की छत्रछाया में रहने को विवश हुए।

कला और संगीत प्रेमी वाजिद अली शाह ने मटियाबुर्ज में एक दूसरा ही लखनऊ बसा लिया। भूतपूर्व नवाब के आखिरी दिन हालांकि बड़े संघर्ष और मायूसी में बीते और उन्हें कुछ समय तक बन्दी भी रहना पड़ा, इन सबके बावजूद वे जनता और अपनी संस्कृति से उदासीन नहीं रहे। बुरे दिनों में भी उन्होंने लखनऊ की संस्कृति को बचाये रखने की कोशिश की। कोलकाता की संस्कृति पर आज भी उसका असर नज़र आता है।

प्रसिद्ध पत्रकार श्रीपान्थ ने पर्याप्त श्रम करके विविध दस्तावेजों से नवाब के अन्तिम कुछ वर्षों की प्रमाणिक सामग्री जुटायी है। वाजिद अलीशाह के जीवन के ढेरों जाने-अनजाने पहलुओं, उनकी वंश परम्परा और तत्कालीन परिवेश की व्याख्या सम्मत जानकारी इस पुस्तक की विशेषता है। आम पाठकों को इसमें उपन्यास जैसा आनन्द आएगा।


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