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Medal / Neelganj Ke Phalman Sahab

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81-89850-80-6
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Preface

मेडल /नीलगंज के फालमन साहब 

उस साल बरसात के मौसम में, गर्मी की छुटि्टयों के कुछ दिन बाद एक दिन मैं अपनी क्लास में पढ़ रहा था। तभी मैंने देखा एक छात्र दूसरे छात्र के हाथ से कोई चीज छीनने की कोशिश कर रहा था। उन दोनों को पढ़ाई में मन न लगाने के कारण मैंने एक छात्र को  डांटा। तभी एक-दूसरे छात्र ने कहा, सर, कामाख्या सुधीर का मेडल छीन रहा था।''

''किसका मेडल? किस बात का मेडल?''

सुधीर खड़ा होकर बोला, ''मेरा मेडल सर!''

दूसरे लड़के की तरफ देखते हुए मैंने पूछा, ''कामाव्या , तुम उसका मेडल छीन रहे थे?''

कामव्या उर्फ कामाव्याचरण मौलिक नामक लड़के ने कहा, ''मैं छीन नहीं रहा था सर! देखना चाहता था, वह नहीं दे रहा था...।''

''अगर वह अपना मेडल न दे तो क्या तुम्हें उसे छीन लेने का अधिकार है? बैठ जाओ, अब ऐसा मत करना...।''

यह कहने के बाद सुधीर की तरफ देखते हुए मैंने क्लास के लड़कों में परस्पर भाईचारा और प्रेम के औचित्य के बारे में एक छोटा-सा भाषण भी दिया। इसके बाद कुछ कौतूहल से मैंने उससे पूछा, 'जरा तुम्हारा  मेडल तो देखूं? कहाँ मिला यह मेडल?''

नीली कोठी के जमाने में फालमन साहब के पिता लालमन (लालमूर) साहब का इस इलाके में बड़ा प्रभाव था। नील की खेती खत्म हो जाने के बाद काफी लम्बी-चौड़ी जमीन्दारी के मालिक होकर वे यहाँ रहने लगे थे। धीरे-धीरे जमीन्दारी का बड़ा हिस्सा हाथ से निकल गया। लालमन साहब की मौत भी हो गई। फालमन एक काफी बड़े हिस्से में आउस और आमन धान की खेती करने लगे। उन्होंने अच्छी-अच्छी गायें खरीदीं, इन्हीं के साथ बत्तख, मुर्गी, भेड़ और बकरियां भीं। साहब की कोठी में एक कतार से बीस-तीस धान के गोले थे। जमीन्दारी भी थी। कोठी के पूरब की तरफ के पीले रंग के बड़े कमरे में (जिसके सामने बैंगनी पैटेनफूल का भारी-भरकम पेड़ था, दरअसल वह कौन-सा फूल था, पता नहीं। हम लोग उसे 'पैटेन' फूल कहते थे) कोठी के साहबों के नायब षडानन बंशी कचहरी लगाते थे और रिआया को दण्ड देते थे। लालमन साहब मूलतज् कहाँ के रहनेवाले थे, कह नहीं सकता, लेकिन उनके बैठकखाने में एक बड़ी तस्वीर के नीचे लिखा था, टी. लालमूर ऑफ बर्नमाउथ, इंग्लैण्ड। फालमन साहब नीलगंज में ही पैदा हुए थे। वे जशोर जिले के गांवों के किसानों की बोली में ही बात करते थे।


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