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Mein Tat Par Hoon

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ISBN:
81-89850-38-5
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Preface

मैं तट पर हूँ 

इस संकलन की 'मैं बहुत परवश हूँ,' 'एक लहर', 'एक ही फूल', 'अनुगूँज', 'चाँद नभ से जा चुका है' आदि बहुत-सी कवितायें एक पत्र-मित्र के प्रेम से जुड़ी हुई हैं, जो पत्रों में ही चुक गया था और फिर उसकी अपनी सा¡सों में भी। अठारह, बीस-इक्कीस की उम्र ऐसी होती है, जब प्रेम की खोज अपना तम्बू पूरे अस्तित्व में इस तरह तान लेती है कि यात्रा का कोई होश ही नहीं रहता। और जब तम्बू उखड़ता है तो पैर सबसे नज़दीक के रास्ते को ही अपना मान लेते हैं। कहीं कोई लक्ष्य नहीं, गन्तव्य नहीं, सिर्फ रास्ता, सही या गलत। सांसारिक बुद्धि की गणना, और विवेक के विश्लेषण का अभाव दुहरी मात देता है—इस तरह जीवन नुकसान के अन्दर चलता रहता है।

पर प्रेम की शक्ति असीम है, अन्दर यदि वह है तो, उतनी ही बड़ी शक्तिमत्ता के साथ।

प्रेम ने मुझे बार-बार परीक्षित और परिष्कृत किया है। आज वह भागवत-प्रेम की चिन्तन-मणि है, सुमिरन का मनका।

मन जो रुकता ही नहीं था, कहीं थमता ही नहीं था—वह आज रुक गया है, स्थिरता के अर्थ में, जो यात्रा को।

अमृता भारती


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