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Meri Priya Sampadit Kahaniya (Avadhnarayan Mudgal)

RRP:
Rs 350.00
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ISBN:
81-89850-26-1
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Preface

मेरी प्रिय सम्पादित कहानियां (अवध नारायण मुद्गल) 

व्यास पीठ पर पीठासीन लेखक का भी एक व्यास होता है—संपादक, खासकर पत्रिका के परिप्रेक्ष्य में, जिसका अपना विवेक होता है, अपनी सत्ता। वही तय करता है कि क्या छपेगा, क्या नहीं। वही निर्धारित करता है कि कैसा होगा उसका वाह्य रूप और क्या होगी उसकी अन्तरात्मा या अन्तर्वस्तु। अपने संपादन काल में हर संपादक को भीड़ से गुजर कर हर अंक के लिए बेहतर कहानियां चुननी पड़ती हैं और हर चयन के लिए वह जवाबदेह होता है। पत्रिका में प्रकाशित कहानियां संपादक का आईना भी होती हैं या यूं कहें, कहानियों का वह निकष होता है, या कहानियां खुद उसका निकष होती हैं। अपने दीर्घ संपादन अवधि में अपने द्वारा चयनित-प्रकाशित कुल कहानियों में से हर संपादक की स्मृति में कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं जो उसके लिए विशेष महत्त्व रखती हैं। हिन्दी कथा पत्रिका 'सारिका' का एक गौरवमय इतिहास रहा है। न जमाने में 'सारिका' और कथा साहित्य दोनों एक दूजे के पर्याय हुआ करते थे। इस सन्दर्भ में सन् 1990 तक क्वसारिकां के संपादक रहे अवधनारायण मुद्गल का दस वर्षों का संपादन काल एक विशेष महत्त्व रखता है—देश-काल के पैमाने से भी और पत्रिका के इतिहास के पैमाने से भी। उन्होंने अपने संपादन-काल की चौदह सर्वाधिक प्रिय कहानियों का चयन किया है। पाठकों को निश्चय ही हिन्दी की कुछ विशिष्ट कहानियां पढ़ने का अवसर मिलेगा।


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