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Meri Priya Sampadit Kahaniya (Rajendra Yadav)

RRP:
Rs 450.00
Your Price:
Rs 338.00 (You save Rs 112.00)
ISBN:
978-81-89962-05-0
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Preface

मेरी प्रिय सम्पादित कहानियां (राजेन्द्र यादव)

व्यासपीठ पर पीठासीन लेखक का भी एक व्यास होता है—संपादक, खासकर पत्रिका के परिप्रेक्ष्य में, जिसका अपना विवेक होता है, अपनी सत्ता। वही तय करता है कि क्या छपेगा, क्या नहीं। वही निर्धारित करता है कि कैसा होगा उसका वाह्य रूप और क्या होगी उसकी अन्तरात्मा या अन्तर्वस्तु।

अपने संपादन काल में हर सम्पादक को भीड़ से गुजरकर हर अंक के लिए बेहतर कहानियां चुननी पड़ती हैं और हर चयन के लिए वह जवाबदेह होता है। पत्रिका में प्रकाशित कहानियां संपादक का आईना भी होती हैं या यूं कहें,कहानियों का वह निष्कर्ष होता है। अपने दीर्घ संपादन अवधि में अपने द्वारा चयनित-प्रकाशित कुल कहानियों में से हर संपादक  की स्मृति में कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं जो उसके लिए विशेष महत्त्व रखती हैं।

इस संकलन के संपादक प्रख्यात कथाकार और आलोचक राजेन्द्र यादव ने हाला¡कि नयी कहानी को पहचान दिलाने और उसे स्थापित करने में कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ उल्लेखनीय महत्त्वपूर्ण काम किया लेकिन अपने दोनों मित्रों की तरह संपादक के रूप में नयी कहानी की बागडोर उन दोनों कथाकारों के सक्रिय रहते नहीं संभाली,मगर अस्सी के उत्तरराद्ध में उन्होंने इसकी जरूरत महसूस की और 'हंस'पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के जरिये राजेन्द्र जी ने कहानी में आये बदलाव को रेखांकित करना शुरू किया और अनगिनत नये रचनाकारों को पहचान दिलायी। 'हंस' के  प्रारंभिक चार वर्षों में प्रकाशित ऐसी ही कुछ कहानियों का खुद उनके द्वारा चयन इस संकलन में प्रस्तुत है।


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