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Meri Priya Sampadit Kahaniya (Ravindra Kaliya)

RRP:
Rs 380.00
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Rs 285.00 (You save Rs 95.00)
ISBN:
81-89914-60-X
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Preface

मेरी प्रिय सम्पादित कहानियां  (रवीन्द्र कालिया)

व्यासपीठ पर पीठासीन लेखक का भी एक व्यास होता है—संपादक, खासकर पत्रिका के परिप्रेक्ष्य में, जिसका अपना विवेक होता है, अपनी सत्ता। वही तय करता है कि क्या छपेगा, क्या नहीं। वही निर्धारित करता है कि कैसा होगा उसका वाह्य रूप और क्या होगी उसकी अन्तरात्मा या अन्तर्वस्तु।

अपने संपादन काल में हर संपादक को भीड़ से गुजरकर हर अंक के लिए बेहतर कहानियां चुननी पड़ती हैं और हर चयन के लिए वह जवाबदेह होता है। पत्रिका में प्रकाशित कहानियां संपादक का आईना भी होती हैं या यूं  कहें, कहानियों का वह निष्कर्ष होता है।

रवीन्द्र कालिया खुद तो कुशल कथाकार हैं ही,संपादक के रूप में उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है। भाषा,धर्मयुग,गंगा यमुना,वर्तमान साहित्य आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहीं बतौर सहायक तो कहीं पूर्वकालिक संपादक के रूप में उन्होंने अपनी क्षमता दर्शायी है। कोलकाता से प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका क्ववागर्थं के व्यासपीठ पर आसीन होकर कालिया जी ने नये लेखकों की ऐसी ढेरों कहानिया¡प्रकाशित कीं जिन्होंने हिन्दी कथा जगत को समृद्ध बनाया। उसी पत्रिका से उनके द्वारा चयनित ऐसी ही कुछ उल्लेखनीय कहानियां इस संग्रह में प्रस्तुत हैं।


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