Loading... Please wait...

Mitti Par Sath Sath

RRP:
Rs 100.00
Your Price:
Rs 75.00 (You save Rs 25.00)
ISBN:
81-89850-37-9
Author:
Cover:
Quantity:
Bookmark and Share


Preface

मिट्टी पर साथ साथ 

मैंने अपनी सब बाँहें फैला ली हैं

उन पर दियों की पाँतें जला ली हैं...

कविता में ऐसी चित्रात्मकता कई स्थलों पर है।

कविता का 'वहं एक फकीर है—उसमें गुरुता भी है और प्रियता भी।

विध्वंसकारी 'मिशन' में इस देश का सूर्य उगता देखती हूँ।...

इस कविता में मैं कितनी शेष हूँ, मापांकन नहीं करना चाहती। सब शायद कभी नहीं चुकता।

तीस वर्ष पहले इस कविता की कुछ ही प्रतिया¡ प्रकाशित हुई थीं। धर्मवीर भारती ने इसे पढ़कर मुझसे कहा था—' वर्ल्ड पोएट्री' में यह मुहावरा देखने को नहीं मिला। उनकी इस अनुशंसा को कितनी दूर तक स्वीकार करूं, नहीं जानती।

मैं इतना ही जानती हूँ कि अपनी कविता के बारे में मैंने अपना मौन कभी नहीं तोड़ा, क्योंकि यही मेरे लिए स्वाभाविक था।

अमृता भारती


Find Similar Books by Category


You Recently Viewed...