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Mukti

RRP:
Rs 500.00
Your Price:
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ISBN:
81-89850-05-9
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Preface

मुक्ति

घोंसला मैंने चिड़या को घोंसला बनाते देखा है मैंने उसे दाना चुगते और झट से आकाश में उड़ते देखा है मैं चाहता हू¡ कि चिfड़या मुझे भी यह सब सिखाए कि किस तरह जमीन से जुड़े रहकर आकाश में उड़ा जा सकता है,कि किस तरह असीम आकाश में उड़ने का अहसास एक घोंसले में रहकर भी जीवित रखा जा सकता है। भगवान कितना बड़ा है मैंने एक बच्चे से पूछा उसने दोनों हाथ फैलाये और जैसे मुझे समझाया कि इतना बड़ातब सचमुच मुझे भी लगा कि जितना जिसके जीवन में समा जाए भगवान उतना ही बड़ा। मुखौटे अपने बच्चों को डराने-धमकाने हमने कुछ डरावने चेहरे अपने लिए बनवाये थे बच्चे कुछ दिन डरते रहे फिर असलियत जानकर हसते रहे  अब बच्चे बड़े हो गये हैं हमारे चेहरे लगाकर हमें ही डरा रहे हैं।


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