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O Re Manghi

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Rs 300.00
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ISBN:
81-89914-09-X
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Preface

ओ रे मांझी 

'दो बीघा जमीन', 'परिणीता', 'देवदास', 'मधुमती', 'सुजाता', 'बन्दिनी',—एक-एक फिल्म, एक-एक मील का पत्थर! ये कोरी फिल्में नहीं हैं बल्कि काल के फलक पर उकेरे गये जीवन्त चित्र हैं जहा¡ साहित्य, कला और संस्कृति के सारे अनुशासनों की त्रिवेणी बहती है।

यूं ही नहीं बनतीं कालजयी फिल्में, यूं ही नहीं बहती यह त्रिवेणी! उसके पीछे फिल्मकार की कितनी प्रतिभा, कितना शोध, कितनी तकनीकी समझ, कितनी संवेदना और कितना श्रम लगा होता है! सत्यजित राय तक ने स्वीकारा है कि बिमलराय ने अपनी हिन्दी फिल्मों द्वारा पहले ही वह जमीन तैयार कर दी थी जिस पर उन जैसे फिल्मकार बाद में जाकर खड़े हुए। बिमलराय की फिल्में अतीत-राग भी हैं और भविष्य दीप्त भी। भारतीय सिनेमा की जितनी बुलन्द शख्सियत है विमलराय, उतनी ही खामोस गहराइयों में डूबी हुई हैं उनकी मर्मभेदी अंतर्ध्वनियाँ।

इस 'मौन' को मुखर करते हैं हिन्दी फिल्मों के जाने-माने समीक्षक और वरिष्ठ हिन्दी लेखक प्रह्लाद अग्रवाल—कभी सत्यजित राय के कोण से, कभी नबेन्दु घोष के, कभी एस.डी. वर्मन, कभी सलिल चौधरी तो कभी किसी और कोण से...


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