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Ok Bhar Jal

RRP:
Rs 175.00
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ISBN:
978-81-89962-45-6
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Preface

ओक भर जल 

कोई ओढ़े फकत फकीरी

बैठ बुने सन्नाटे

तब खेले शब्दों से अपने

कविता अपनी बांटे।

सन्नाटों को बुनती सुनीता जैन की कविता का फकीरी अन्दाज हिन्दी कविता में अपनी अलग विशिष्ट पहचान रखता है।

उनकी प्रेम कविताए जीवन रस का महारास रचती हैं—उनका उन्मेश मृत्यु को भी मन्त्र बना देता है।

यदि कविता में शब्द की नई पहचान पैदा करना ही कर्म है—तो सुनीता जैन की कवितायें बखूबी यही करती हैं। इन कविताओं में स्मृति का भरपूर रोमांस है और स्मृति विमुख हो जाने का क्षोभ भी -

मेरे भीतर शब्दों की

सरसाई सृष्टि

बची रही जाने कैसे

इस डरावनी दिल्ली में भी।

यह शब्द सृष्टि और शब्द वैभव सुनीता जैन की कविता का अर्जित लक्ष्य भी है और मर्म भी, तभी तो वे कहती हैं—

अपने ही शब्दों के वैभव से

मैंने खुद को धनवान समझा।

ओक भर जल सुनीता जैन का संभवत: काव्य संकलन है। इन कविताओं में निहित है कवयित्री का अपना मनुष्य होना और मनुष्य भी प्रेम की तरह होना या स्वयं प्रेम होना।


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