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Parinita / Path ke davedar

Price:
Rs 395.00
ISBN:
978-81-908657-2-2
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Preface

परीणिता / पथ के दावेदार

शेखर के कमरे के सामने जो खुली हुई छत थी, उस पर खड़े होने से ललिता की छत का सब कुछ दिखाई देता है। कहीं ललिता से सामना न हो जाय, इस डर से वह छत पर भी नहीं जाता। लेकिन जब बिना किसी आफत-विपत के महीना-भर बीत गया तब वह बेफिक्री की साँस लेकर मन-ही-मन बोला, आखिर कुछ भी हो, औरतों के लिहाज-शरम तो होती ही है—वे ये सब बातें प्रकट कर ही नहीं सकतीं।

शेखर ने सुन रखा था कि औरतों की छाती फटे तो फटे पर मुँह नहीं फटता। इस बात पर आज विश्वास हो गया और ऊपरवाले ने उनके तन-मन में कमजोरी भर दी है, इसके लिए उसने मन-ही-मन उसकी तारीफ भी की!—मगर फिर भी उसे शान्ति क्यों नहीं मिल रही है? जब से वह समझ गया है कि अब डर की कोई बात नहीं, तभी से उसकी छाती में एक तरह की अजीब-सी टीस क्यों भरती जा रही है?—रह-रह कर उसका दिल अपनी गहराइयों तक इस तरह निराशा, पीड़ा और आशंका से क्यों काँप उठता है? अब क्या ललिता तो अब कोई बात किसी से कहेगी नहीं, और किसी के हाथ अपने को सौंपते समय तक मौन ही बनी रहेगी। तब फिर इस बात का खयाल आते ही कि उसका ब्याह हो चुका है और वह अपने पति का घर बसाने चली गयी है, उसके मन और शरीर में इस तरह आग-सी क्यों धधक उठती है?

इससे पहले शाम के वक्त बाहर घूमने न जाकर शेखर सामने खुली छत पर टहला करता था, अब भी टहलने लगा; लेकिन एक दिन भी उस घर का कोई जना उसे छत पर नहीं दिखाई दिया। सिर्फ एक दिन अन्नकाली छत पर किसी काम से आयी थी, लेकिन उसकी तरफ देखते ही उसने ठिठक कर निगाह नीची कर ली और शेखर के यह तय करने के पहले ही कि वह उसे बुलाये या नहीं, वह वहाँ से अदृश्य हो गयी।


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