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Pasangatha

RRP:
Rs 195.00
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ISBN:
978-81-89962-10-4
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Preface

पाषाण गाथा

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी को हिमांशु जोशी की कहानियों के बगैर पहचाना नहीं जा सकता। हिन्दी कहानी ने जितनी भी रचनात्मक मंजिलें तय की हैं, उन रचना-यात्राओं और मंजिलों पर उनकी कोई न कोई कहानी साथ चलती या मंजिल पर मौजूद मिलती है।

हिमांशु जोशी कहानी नहीं लिखते और न इनकी कहानियां बंधे-बंधाये ढांचे में रूपाकार ग्रहण करती हैं बल्कि वे मानव को उद्वेलित करके अपन विधागत स्वरूप और महत्ता प्राप्त करती हैं। घटना, बात या सरोकार को कहानी की संवेदनात्मक सिद्धि दे देना उनकी नितान्त अपनी विलक्षण कथन-प्रतिभा और उपलब्धि है। उनकी कहानियों में रचना और जीवन की अद्वितीय अन्विति है...जीवन-यथार्थ रचना बनता है और रचना कैसे जीवन-यथार्थ का पर्याय बन जाती है, यह उनकी दुर्लभ सृजन की कालजयी प्रतीति है जो स्मृति को धरोहर बन जाती है। उनकी कितनी कहानियों को याद करूं....क्वजलते हुए डैनें, 'अन्ततज्', हवेनसांग...', 'एक बार फिर' आदि को रेखांकित करूँ तब भी दसियों उत्कृष्ट कहानियां रेखांकित किये जाने की मांग करती हैं...

यह सही है कि हिमालय की हर चट्टान से गंगा नहीं निकलती, लेकिन हिमांशु जोशी के अनुभवजन्य हिमालय की प्रत्येक चट्टान से एक गंगा या एक उर्वरा नदी निश्चय ही निकलती है!


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