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Pathar Al Pathar / Gram Raakh

Price:
Rs 515.00
ISBN:
978-81-908657-0-8
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Preface

पत्थर अल पत्थर / गर्म राख

 

  आर्थिक और सामाजिक रूप से लडख़ड़ाते हुए मध्यवर्गीय समाज का सफेदपोश तबका ‘गर्म राख’ में बड़ी ही मार्मिकता से अंकित हुआ है। पात्रों के चित्रण में जीवन का स्पर्श है। अश्क की चित्रांकन-शक्ति की प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता।

अमृतलाल नागर

   ‘गर्म राख’ उपेन्द्रनाथ अश्क का तीसरा उपन्यास है। हिन्दी जगत में उनके दूसरे उपन्यास—‘गिरती दीवारें’—का अच्छा स्वागत हुआ था। ‘गर्म राख’ मेरे विचार में उनसे कहीं चुस्त, कहीं प्रौढ़ और कहीं व्यापक कृति है...‘गर्म राख’ सामाजिक प्रेरणा से लिखी कृति है...उपन्यास-दर्पण में समाज को प्रतिबिम्बित करने में अश्क बहुत कुछ बाल्ज़ाक और ज़ोला की भाँति सफल हुए हैं।


भगवतशरण उपाध्याय

मेरा यह दावा है कि एक शहर अपनी अधिकतम विशेषताओं के साथ किसी भी उपन्यास में शायद ही इतना मुख हुआ हो, जितना लाहौर ‘गर्म राख’ में हुआ है। वहाँ की भीड़, धूल-धक्कड़, कहकहे, गन्दगी, भैंसों की पूँछों से उछलता हुआ कीचड़, ताँगे, $फैशन, सुबह-शाम, स्त्री-पुरुष, पंजाबी गालियाँ और सम्बोधन—सबकुछ इतने उभरकर सामने आये हैं कि उपन्यास वातावरण में रहकर आये हों।

राजेन्द्र यादव

   इस वातावरण में हम सामाजिक कुरीतियाँ और कुरूपताएँ तो उनकी समस्त विषमता में देखते ही हैं, साथ ही हम उनके उठते और उफनते हुए सामाजिक आन्दोलन और हलचलें भी देखते हैं, जो नये जीवन की सृष्टि के लिए आतुर हैं। अश्क ‘गर्म-राख’ ही को नहीं देखते, वरन उसके अन्दर छिपी जीवन-चिनगारी को भी देखते हैं। ‘गर्म राख’ जीवन के व्यापक और गतिमान स्वरूप का अधिक सच्चा और समर्थ चित्र है।

प्रकाशचन्द्र गुप्त


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