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Phat ja panchdhar

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ISBN:
81-89914-02-2
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Preface

फट जा पंचधार 

कतिपय हिन्दी समीक्षकों के अनुसार विद्यासागर नौटियाल हिन्दी के सबसे छोटे वाक्यों में लिखनेवाले बड़े कहानीकार है तो कुछ ऐसे भी समीक्षक हैं जिनके अनुसार नौटियाल को पढ़ते हुए पाठक के अन्दर पूरा पहाड़ जाग उठता है। इसमें कोई शक नहीं कि परिवेश पर नौटियाल जी की अद्भुत पकड़ होती है।

अपने कथा लेखन में नौटियाल बार-बार पहाड़ पर ही लौटते हैं, गो, कथा विन्यास में उनका यह लौटना किसी दूसरे पहाड़ी लेखक की तरह नहीं होता। उनके कथा-लेखन की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे पहाड़ के भीतर किसी विदेशी पर्यटक की तरह नहीं प्रवेश करते बल्कि पहाड़ी जीवन के संघर्ष को, उसकी अदम्य जिवीविषा को तमाम प्रचलित मिथों, किमबदन्तियों, रूढ़ियों, अन्धविश्वासों को चीरते हुए वहाँ से हर बार एक नयी कथाशैली और प्राविधि के साथ चुपचाप पहाड़ और पहाड़ी लोगों के अकेलेपन में जीवन्तता और मार्मिकता से उठाते हैं।

यही वजह है कि पहाड़ी स्त्रियों पर केन्द्रित विद्यासागर नौटियाल की इन कहानियों में पहाड़ की औरतों का पूरा संसार बोलता है, उनकी हंसी बोलती है, दर्द बोलता है, आहें और कराहें बोलती हैं।


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