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Phatik Chand

RRP:
Rs 80.00
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ISBN:
81-89850-28-8
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Preface

फटीक चन्द 

जंगल के बाहर वह सड़क एक चौड़ी सड़क से मिल गई थी। अब वह किधर जाये उसे नहीं पता था। आखिर बिना कुछ सोचे-समझे वह दाहिने तरफ मुड़कर कुछ दूर जाने के बाद हिम्मत हारकर एक अपरिचित पेड़ के नीचे बैठ गया। पेड़ के तने पर सफेद-काले ज़ेबरा निशान बने थे। केवल इसी पेड़ के तने पर ही नहीं, सड़क के किनारे दोनों तरफ दूर-दूर तक जितने भी पेड़ थे, उन सभी पर इस तरह के निशान बने हुए थे। किसने बनाये थे ये सफेद-काले ज़ेबरा निशान? क्यों बनाये थे? काफी सोचने पर भी उसे यह बात समझ में नहीं आयी।

 वह अब और सोचना नहीं चाहता था। उसका सर फिर से झनझना रहा था। साथ ही उसे महसूस होने लगा था कि उसकी नाक सिकुड़ रही है। उसके बाद ही उसकी आँखों के सामने से पेड़, सड़क, सफेद-काले, पीले-हरे सबकुछ गड्डमड्ड होकर ओझल हो गये। 

 


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