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Raja Ki Bimari

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81-89850-09-1
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Preface

राजा की बीमारी 

इलाज करते भी कैसे! बीमारी तो थी ही नहीं। बस राजा को लगता कि वे बेहद बीमार हैं। मगर वह बीमारी है कहाँ, इसे कोई समझ नहीं पाता था। राजा ने न जाने कितनी तरह की दवाओं का सेवन किया, मगर उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। उनके सिर पर बर्फ रखी गई। पेट सेंका गया। पर बीमारी वैसी की वैसी ही रही।

अब राजा को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, ''भगा दो, इन नालायकों को। इनके पोथी-पत्रों को छीनकर उनमें आग लगा दो।''

इलाज करनेवाले मुह लटकाकर लौट आये। लोगों ने डर के मारे राजा के महल की ओर जाना छोड़ दिया। राजमहल के लोग चिन्ता में पड़ गये कि राजा कहीं बिना दवा के ही न मर जाएँ।

ऐसे समय न जाने कहाँ से एक संन्यासी का आगमन हुआ। उन्होंने कहा, 'राजा को स्वस्थ करने का उपाय मैं जानता हूँ। लेकिन वह बहुत कठिन है। क्या तुम लोग वैसा कर पाओगे?

मन्त्री, कोतवाल, सेनापति, राजा के निकट के सभी लोगों ने कहा, ''क्यों नहीं कर पाएंगे? अगर इसमें जान भी जाये तो मंजूर है।''

यह सुनकर संन्यासी ने कहा, ''पहले एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करो, जिसके मन में कोई चिन्ता न हो, जो हर हाल में खुश रहता हो।''

लोगों ने पूछा, ''उसके बाद?''

संन्यासी बोले, ''उसके बाद उस व्यक्ति के कपड़े अगर एक दिन के लिए राजा पहन लें और उस व्यक्ति के गद्दे पर रात भर सो लें, तब देखना उनकी बीमारी दूर हो जाएगी। वह एकदम ठीक हो जाएगे।''


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