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Samudra

RRP:
Rs 175.00
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ISBN:
978-81-89962-50-0
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Preface

समुद्र

समुद्र यानी एक अगाध विस्मय। युगों से मनुष्य इस अगाध विस्मय से रू-ब-रू होता रहा है। ईसा पूर्व युग में ग्रीक दार्शनिक अरस्तू ने अपनी 'मेटिओरलॉजिक'नामक कृति में पहली बार समुद्र के उद्भव की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की थी। समग्र ऐतिहासिक युग से ही मनुष्य अपने चारों ओर की इस अनन्त जलराशि के बारे में जानने का आग्रही तथा परम कुतूहली रहा है। इसके छिपे रहस्यों को ढूँढने और इस विस्तार पर आधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा करता रहा है।

उन्नीसवीं सदी में 'चैलेंजर' अभियान के द्वारा जिस संगठित समुद्र-विज्ञान पर अध्ययन का प्रारंभ हुआ था वह आज पूरी दुनिया में फैल चुका है। मनुष्य आज समुद्र के गहन रहस्यों को भेदने के लिए कमर कस चुका है। समुद्र के अम्यन्तर में जो कुछ भी है, उसे जानने के लिए आज आधुनिक यन्त्रों और यन्त्र मानव की मदद ली जा रही है। इसके अलावा उपग्रहों के जरिये भी समुद्र के रहस्यों को जानने का प्रयास हो रहा है।

यह पुस्तक इस विषय की ऐसी पुस्तक है, जिसमें समुद्र विज्ञान से संबद्ध पाठकों के अलावा आम पाठकों को भी समुद्र के बारे में जानने के लिए काफी कुछ मिलेगा।


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