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Sansar Mein Nirmal Varma

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ISBN:
81-89850-71-7
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Preface

संसार में निर्मल वर्मा 

पोलैण्ड के, बीसवीं सदी के, तीन महान कवियों में ज़िबग्येव हेर्बेर्त का नाम उल्लेखनीय है। साम्यवादी व्यवस्था में रहते हुए उन्होंने मनुष्य की बराबरी का स्वप्न देखा और साम्यवादी पोलैण्ड की दमघोंटू राजनीतिक हालात का उन्होंने मुकाबला भी किया। उनकी कवितायें  द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके बाद के कालखण्ड का एक जीवन्त आईना हैं।

हेर्बेर्त ने सत्ता के निषेधों के बीच अपनी कविताओं,विशेषकर गद्य कविताओं,के जरिये अपनी अलग राह बनायी। उन्होंने लोकसाहित्य का सहारा लिया और अपने देश के पारम्परिक किस्सों और दन्त कथाओं के कथ्य में वे दरारें खोजीं, जिनके जरिये वे अपनी बात कह सकते थे। मनुष्य के आत्म-निर्वासन का भाव उनके यहाँ  एक अनूठी आध्यात्मिक  क्षुब्ध अवस्था में व्यक्त हुआ है।

हालांकि हेबेर्त ने अपना अधिकांश संघर्ष देश में रहकर ही किया, इसके बावजूद एक विस्थापित व्यक्ति की तड़प उनकी रचनाओं में नज़र आती है जो उनकी रचनाओं से गुजरनेवाले को बेचैन बनाती है। यह बेचैनी ही मनुष्य को एक दूसरे से जोड़ती है, भले ही वह कहीं का निवासी हो। इन कविताओं की सार्थकता ही यही है कि किसी भी संवेदनशील पाठक को ये कवितायें बिलकुल अपनी लगेंगी; एक निजी वस्तु की तरह वह कवि की भावनाओं को सहेजकर रखना चाहेगा।


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