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Sant - 2

RRP:
Rs 280.00
Your Price:
Rs 210.00 (You save Rs 70.00)
ISBN:
978-81-89962-77-7
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Preface

सन्त-2

साधु, सन्तों, दरवेशों और फकीरों की इन कथाओं में हमें आगाह किया गया है, बड़ी मृदु मार्मिकता से कि हम सिर्फ हम हो सके—रह सके, हर परता और परायेपन से अलग, स्वच्छ, स्वयं, नैसर्गिक, अपनी आत्मप्रकृति के अन्दर। यदि कहीं कोई कथा, उसका कोई वाक्य या शब्द हमारे अन्दर इस सानिध्य को घटित कर सके तो यह एक सार्थकता होगी, उसका प्रयोजन पूरा होगा। जीवन अनमेल होने से बच जाएगा। हमारे घोल में प्रांजलता होगी, अपमिश्रित तत्वों का प्रवेश नहीं हो सकेगा।

इन कहानियों का संचयन करते हुए बहुत नया कुछ सीखा और दिनचर्या की छोटी-छोटी बातों में भी बदलाव की आकांक्षा जाग्रत हुई। हर 'अनावश्यक' से हटने की इच्छा हुई। एक श्लोक की एक पंक्ति याद आ गई, 'अनित्य' खण्डयेत् सर्वयत्कंचित् आत्मगोचरम्। जो कुछ भी अनित्य है, अपने अन्दर जिसे भी हम देख पा रहे हैं, उसे हर क्षण काटते जाना। अनित्य वही है जो आरोपित है, 'स्व' से 'आत्म' से भिन्न है।

हर पाठक को अपने स्वभाव के अनुकूल कोई-न-कोई मार्ग-दर्शक संकेत मिल सकता है इन कहानियों में—कोई समाधान, कोई शान्ति, कोई प्रेम या आनन्द। या वह जो प्राप्तव्य है।


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