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Sham Ke Baad

RRP:
Rs 250.00
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ISBN:
81-89850-14-8
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Preface

शाम के बाद 

परिवार में स्त्रियाँ ही अकसर अभिशप्त अहिल्याए¡ होती हैं जिनकी भावनाओं को न पति समझना चाहता है, न सन्तानें। जीवन यूं ही व्यतीत होता रहता है—बेमानी, बेमतलब यन्त्रवत्...! ऐसे शुष्क जीवन के किसी प्रहर में अचानक कोई रस की फुहार, कोई खुशबू-सी झरती है और मुरझाई जीवन-लता कुनमुनाकर ताकती है—क्या जीवन अब भी जिया जा सकता है?

उपन्यास में चाहे स्वैराचारिणी युवती गिगी हो, अपने पोते टुटू की आया बनकर जीवन बितानेवाली प्रौढ़ा विधवा नलिनी हो या कुमारी रहकर मृत्यु का वरण करने वाली झुनू..., सभी इस देह और देहोत्तर प्रश्न से दो-चार होती हैं। सबकी अपनी-अपनी जीवन दृष्टि है, अपनी-अपनी जीवन शैली। गिगी के लिए सन्तान अवांछित बोझ है और सेक्स मनोवैज्ञानिक जय-पराजय का खेल, नलिनी के लिए पोता टुटू स्नेह का आलम्ब है और प्रेम उसकी बन्दी आत्मा की मुक्ति की उड़ान, तो झुनू के लिए सेक्स (और सन्तान) मर्यादा के घेरे में रखा हुआ एक वर्जित फल मात्र! इन सबसे परे एक सत्य और है, प्रेम-लोक के आलोक का सच, जहाँ देह की कंटीली झाड़ीयों को पार करने के बाद ही फूलों के उस उद्यान में पहुंचा जा सकता है।

इस नितान्त व्येक्तित्त्व आत्म-केन्द्रीयता में वह क्या है जो माँ को वात्सल्य से वंचित करता है और दादी को सिंचित!

प्रेम, घृणा, समर्पण, आकर्षण, विकर्षण मानव मन की कितनी ही परतों को खोलता है प्रेम कथा के अद्भुत कथा शिल्पी बुद्धदेव गुहा का यह उपन्यास—'शाम के बाद'।


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